ध्यान गुरु अर्चना दीदी द्वारा
दीपावली का आध्यात्मिक रहस्य
भारतवर्ष के आध्यात्मिक ग्रंथों में ऋषि-मुनियों, सिद्धों, तपस्वियों , सदगुरुओं के रहस्यमयी आध्यात्मिक विज्ञान का संकेत मिलता है | इन्हीं ग्रंथों में एक प्रार्थना अंकित है ---
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योर्तिगमय।
मृत्योर्मामृतम गमय।।
अर्थात् – हे ईश्वर ! हमें असत्य से सत्य की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिए |
इसी प्रार्थना का विस्तृत रूप है ---- प्रकाश पर्व , दीपों का पर्व ---दीपावली | इस उत्सव को मनाने का मूल तात्पर्य है --- सृष्टि की सर्वोच्च सत्ता से प्रार्थना कि हे प्रभु !आप हमें तमस से , अन्धकार से, अज्ञान से, अविद्या से, आलस्य से, अकर्मण्यता से, प्रकाश की ओर, ज्ञान की ओर, विद्ये कि ओर, कर्मण्यता की ओर ले चलिए |
अन्धकार प्रतीक है - जीवन में अज्ञान, आलस्य, अविद्या, निराशा, ईर्ष्या, द्वेष्, काम क्रोध, लोभ, असफलता, शांति आदि विकारों का | प्रकाश प्रतीक है जीवन में ज्ञान कर्मण्यता , विद्या, प्रसन्नता, शांति, प्रेम, त्याग, सफलता, भक्ति साधना आदि सद्गुणों का |
दीपावाली के शुभ अवसर पर सौभाग्य की देवी माता लक्ष्मी एवं मंगलकारी श्री गणेश का पूजन एवं दीप प्रज्वलन का अर्थ है ---- अन्धकार से प्रकाश की ओर मनुष्य की यात्रा , दुर्भाग्य से सौभाग्य की ओर यात्रा , पतन से उन्नति की ओर यात्रा |
दीपावली से कुछ दिन पूर्व सभी अपने गृह की एवं कार्य श्रेत्र की स्वच्छता के लिए विशेष प्रयास करते हैं | घर में जो कुछ अवांछित है , अस्वच्छता एवं अव्यवस्था का कारण है, उसे घर से निकाल दिया जाता है तथा नवीन वस्तुओं से घर की साज सज्जा करते हैं |
माना जाता है कि सौभाग्य की देवी माता लक्ष्मी को अस्वच्छता, अव्यवस्था, तथा शांति रुचिकर नहीं है | अत: माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए घर की स्वच्छता एवं व्यवस्था पर विशेष बल दिया जाता है |
इस का आध्यात्मिक अर्थ है ----- ईश्वर की कृपा उसी व्यक्ति के जीवन में प्रवेश करती है जो भीतर से, अन्त:करण से पवित्र है , शुद्ध है | जिसका हृदय पवित्र है | अत: बाहर की स्वच्छता के साथ परम आवश्यक है ----- भीतर की स्वच्छता , भीतर की शुद्धि , भीतर की पवित्रता | शैशवास्था में हमारा मन विकारों से रहित होता है, इसी कारण एक शिशु के मुख पर भोली मुस्कान होती है, उसके भीतर एक आकर्षण होता है, सौम्यता होती है, किंतु जैसे-जैसे आयु बढ़ती है , मन में छल कपट ईर्ष्या- द्वेष्, क्रोध, निराशा आदि दुर्गुण प्रवेश करने लगते हैं |
जब व्यक्ति सद्गुरु की शरण में जाता है , तो सद्गुरु उसे उसके वास्तविक स्वरूप का स्मरण कराते हैं, उसे दर्पण दिखाते हैं | उस दर्पण में अपने विकार युक्त मन को देखकर व्यक्ति आश्चर्य से भर जाता है | सद्गुरु ही उसे इस मन को स्वच्छ करने की राह दिखाते हैं |
दीपावाली का अवसर वह अवसर है जब हम सद्गुरु की शरण में आकर अपने अस्वच्छ मन को स्वच्छ करने का प्रयास करते हैं | जो कुछ अवांछित है, अभद्र है, मन की अस्वच्छता का कारण बनता है, उसे नष्ट करने का प्रयास करते हैं ।अत: दीपावली का पर्व शुद्धि का पर्व है ---- शरीर , मन, बुद्धि, आत्मा की शुद्धि का पर्व ।
स्वच्छता के पश्चात् हम श्री गणेश एव माता लक्ष्मी का आवाहन करते हैं | उनकी कृपाओं का आवाहन करते हैं | अर्थात् जब मन पवित्र हो जाता है तभी दैवी शक्तियाॅ तथा दैवी गुण भीतर समाहित होते हैं |
माना जाता है कि इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम माता सीता एवं भ्राता लक्ष्मण के साथ १४ वर्षों के वनवास के पश्चात् अयोध्या लौटे थे |
उनके स्वागत में अयोध्या वासियों ने घी के दीप जलाए थे | हम भी दीपावाली के दिन घर के भीतर एवम् बाहर दीपमाला करते हैं | भगवान् श्री राम का अयोध्या पदार्पण प्रतीक है -- असत्य पर सत्य की विजय का | दीपावली के त्योहार का मूल अर्थ भी यही है कि हमारे भीतर जो कुछ असत्य है अज्ञान है - हम उस पर विजय प्राप्त करें तथा भीतर सत्य को स्थापित करें | इस दिन दीपमाला करते हुए तथा पूजन करते हुए हमें यह संकल्प करना चाहिए कि हम सद्गुरु के दिखाए मार्ग पर चलेंगे , सदा सत्य का साथ देंगे | चाहे परिस्तिथियाँ कैसी भी हों, काम, क्रोध, लोभ, अहंकार, कितना भी विचलित करे किंतु हम सत्य के मार्ग पर अडिग रहेंगे |
अन्तत: विजय सत्य की ही होती है | अत: दीपावली पर प्रज्वलित दीपकों का प्रकाश सत्य के प्रकाश का प्रतीक है, आत्मा की उज्वलता का प्रतीक है, परमात्मा के दिव्य प्रकाश की ओर संकेत करता है |
इस दिन हम केवल घर के भीतर ही प्रकाश नहीं करते अपितु बाहर भी दीपमाला करते हैं | इसका अर्थ है कि हम केवल स्वयं के बारे में ही न सोचें अपितु संपूर्ण विश्व के बारे में सोचें | केवल अपने जीवन का अन्धकार दूर करने का प्रयास ही न करें अपितु सभी के जीवन से अन्धकार दूर करने के लिए प्रयास करें |
केवल अपने परिवार का भरण- पोषण ही पर्याप्त नहीं है | दीपावली पर संकल्प करें कि इस समाज में , राष्ट्र में , विश्व में जहाँ – जहाँ अन्धकार है, उसे दूर करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे | अन्धकार कितना भी घना हो, प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने हिस्से का एक दीपक जला ले तो समस्त अन्धकार तिरोहित हो सकता है |
दीपावली पर, अमावस्या की घनघोर रात्रि में दीपमाला कर यही संकल्प करें कि हमारे जीवन से , समस्त प्राणीमात्र के जीवन से समस्त अन्धकार दूर हो |
सद्गुरु भी इसी उद्देश्य को लेकर धरती पर आते हैं कि समस्त धरा परमात्मा के दिव्य प्रकाश से प्रकाशित हो उठे | इसीलिए सद्गुरु मनुष्य मात्र के अन्तःकरण में ध्यान , भक्ति, जप - तप व सद्गुणों के दीप जलाते हैं | जो उनकी शरण में आ जाता है उसे प्रकाश के लिए दीपावली पर्व की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती अपितु उसका प्रत्येक दिन ही दीपावली, होली जैसा उत्सव बन जाता है |
- *ध्यान गुरु अर्चना दीदी*
