यात्रा देवत्व की ओर
हम अभी बाल्यावस्था से अनेक कथाएँ सुनते-पढ़ते
आए है जिसमें देवताओं एवं असुरों के मध्य युद्ध का वर्णन मिलता है | इन कथाओं में
असुरों की आसुरी वृति के वृतांत सुनकर व पढ़कर आश्चर्य होता है कि ऐसा निकृष्ट
कार्य कोई कैसे कर सकता है | और जब कथा के अंत में वर्णन आता है कि अमुक देवता ने
अमुक असुर का अंत कर दिया तो मन में प्रसन्नता का भाव उदय होता है |
किंतु क्या आपने कभी इन कथाओं का गम्भीरता से
चिन्तन-मनन किया है ? यदि गहराई से विचार करें तो आप पाएँगे कि ये देवता और असुर
कोई और नहीं अपितु मनुष्य के मन में उठने वाली दैवी एवं आसुरी वृतियां ही है |
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने दैवी एवं असुरी सम्पदा का उल्लेख किया है | वस्तुतः
देवता और राक्षस दोनों ही हमारे मन में सदैव उपस्थित रहते है | जीवन में प्रतिफल,
प्रतिक्षण उनमे युद्ध चलता है | देवता से अर्थ है –हमारे मन की सात्विक वृति,
सद्गुण, सुविचार एवं सुकर्म की भावना – पवित्रता, कर्मठता, उत्साह, सकारात्मकता,
परोपकार, प्रेम, साधना, भक्ति, त्याग, शालीनता, शांति — यह हमारी दैवी सम्पदा है,
हमारे भीतर की दैवी शक्ति है | इसके विपरीत असुर से तात्पर्य है – हमारे मन की
तामसिक वृति, दुर्गुण, कुविचार एवं कुकर्म की भावना – आलस्य, प्रमाद, हिंसा,
ईर्ष्या-द्वेष्, क्रोध, स्वार्थ, नकारात्मकता, घृणा, छल-कपट – यह आसुरी सम्पदा है,
हमारे भीतर की आसुरी वृति है |
जीवन के हर मोड़ पर, हर पढ़ाव पर, हर पल
इनमें युद्ध होता है | जब दैवी वृति आसुरी वृति को परास्त कर उस पर हावी हों जाती
है | तो हम सद्गुरु के, ईश्वर के निकट हो जाते है, उनकी कृपाओ के पात्र बन जाते है
| किंतु जब आसुरी वृति दैवी वृति को परास्त कर देती है तो हम सद्गुरु से, ईश्वर से
दूर हों जाते है |
इसे उदाहरण से समझिए – उषाकाल की पवित्र
बेला, आसमान में चंद्रमा व सितारों का साम्राज्य चल रहा है, भगवान भुवनभास्कर का
साम्राज्य व्याप्त होने को तत्पर है, पक्षियों की आवाजें कर्णो में आने लगी है |
मनुष्य की निंद्रा में अलसाई आँख खुलती है, भीतर से प्रभात का संकेत मिलता है और
इसी क्षण देवताओं व असुरों का युद्ध शुरू हो जाता है | प्रभात के सौंदर्य का अपन
दिव्य आकर्षण है, चारों ओर सात्विकता है, ध्यान, जप भक्ति की मधुर बेला है किंतु
दूसरी ओर निंद्रा का अपना आकर्षण है | अलसाई आँखे क्षण भर को खुलती है, फिर बंद
हों जाती है | मन में एक द्वंद का जन्म होता है | मन की दैवी वृति जागने के लिए
प्रेरित करती है, शैया का त्याग कर, स्नान-ध्यान- पूजन के लिए प्रेरित करती है तो
आसुरी वृति निंद्रा की ओर प्रेरित करती है, निंद्रा के आकर्षण में बाँधती है | कुछ
क्षण तक यह युद्ध चलता है | जिस व्यक्ति में दैवी वृति विजयी होती है,वह शैया का
त्याग कर उठ खड़ा होता है| इसके विपरीत जिस व्यक्ति में आसुरी वृति जीत जाती है वह
आँखे खोलकर भी, भीतर के संकेतों को सुना-अनसुना कर पुन: निंद्रित हों जाता है |
प्रभात का समय गवाँकर स्वास्थ्य व परमार्थ दोनों से ही हाथ धो बैठता है |
धन्य है वे मनुष्य जिनके भीतर के युद्ध में दैवी वृति की विजय होती है, वे
उतरोतर परमात्मा के निकट होते जाते है |
किंतु जिनके भीतर आसुरी
वृति की विजय होती है – वे भी दो प्रकार के मनुष्य होते है – एक वे जो इस विजय के
पश्चात पश्चाताप करते है, स्वंय को दोष देते है, इसे अनुचित मानते है तथा भविष्य
में दैवी वृति की विजय के लिए संकल्पबद्ध होते है – उनके उत्थान की संभावनाएं बनी
रहती है | किंतु वे मनुष्य भी है जिन्हें इसका कोई पश्चाताप नहीं होता | वे आसुरी
वृति की विजय में ही सतुंष्ट रहते है या कहना चाहिए कि उनके भीतर युद्ध का जन्म ही
नहीं होता | वे आसुरी जीवन से ही संतुष्ट है | अविधा, अज्ञान, आलस्य, अशांति में
ही संतुष्ट है | उनके उत्थान की संभावनाएं भी समाप्त हों जाती है |
किंतु मनुष्य को जीवन मिला
है – देवता बनने के लिए, असुर बनने के लिए नहीं | अत: अपने भीतर के देवत्व को
जागृत कीजिये |






“Life is filled with unanswered questions, but it is the courage to seek those answers that continues to give meaning to life.
ReplyDeleteमार्गदर्शन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद गुरुवर। 👃👃
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