Friday, 5 August 2016

भीतर का संसार

                  भीतर का संसार

व्यक्ति का जीवन स्वयं में एक रहस्य है | सभी के मन में जीवन के विभिन्न आयामों को लेकर अनेक प्रश्न उठते हैं | जिनके उत्तर हम बाहर खोजने का प्रयास करते हैं किंतु खोज नही पाते | वस्तुतः संसार उतना ही नही है जितना हमें स्थूल आँखों से दिखाई देता है | स्थूल आखों की पहुँच से परे भी संसार के अनेक रहस्य हैं | मनुष्य का शरीर भी जो कुछ स्थूल आँखों से दिखाई देता है , मात्र उतना ही नही है | जिस प्रकार नन्हे से बीज में वृक्ष बनने की संभावना एवं  शक्ति छिपी है , उसी प्रकार मनुष्य के भीतर भी अनेक शक्तियाँ छिपी हैं | स्थूल शरीर के भीतर सुक्ष्म शरीर तथा उससे जुड़े अनेक तत्व अत्यंत रहस्यात्मक हैं तथा इन रहस्यों के अनावरण का एक ही माध्यम है – ध्यान |

ध्यान के पथ पर अग्रसर होते - होते वे रहस्य उद्घाटित होने लगते हैं | तथा भीतर की शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं | ध्यान की विशेष विधियों के अभ्यास से , व्यक्ति को वह सुनाई देने लगता है जो कभी नही सुना , वह दिखाई देने लगता है जो कभी नही देखा , वह अनुभूति होने लगती है जिसकी कभी कल्पना भी नही की | किंतु स्थूल कर्णो , स्थूल आँखों तथा स्थूल शरीर का विषय नही है | यह भीतर का संसार है , सुक्ष्म संसार है | जब ध्यान के माध्यम से व्यक्ति इसमें प्रवेश करता है तो आश्चर्य से भर जाता है कि भीतर का सौंदर्य , भीतर का संसार कितना मोहक , कितना आकर्षक तथा कितना दिव्य है , किंतु इसमें प्रवेश सम्भव है ---- सद्गुरु का हाथ थामकर , उनके मार्गदर्शन में उनके शरणागत होकर | स्वप्रयासों से साधक इसमें प्रवेश नही कर सकता | सद्गुरु का मार्गदर्शन ही उसका एक मात्र सम्बल है तथ इस मार्गदर्शन में निष्ठा पूर्वक साधना करते – करते जब वह भीतर उतरता है तो आनंद विभोर हो उठता है | भीतर वे दृश्य दिखाई देते हैं जो स्थूल आँखों से कभी नही देखे जा सकते , वह ध्वनि सुनाई देती है जो स्थूल कणों से कभी नही सुनी जा सकती वह अनुभूतियाँ होती हैं जो शब्दों में वर्णित नही की जा सकती | इतना सौन्दर्यपूर्ण , इतना आनंदपूर्ण एवं विशाल संसार हमारे भीतर है | बाँसुरी के सात स्वरों की भांति ही शरीर में सात चक्र मने जाते हैं जिनमें होकर विधुत की भांति ध्यान की सुक्ष्म उर्जा ऊपर उठती है | उर्जा के सात केन्द्र सात चक्र जब साधना द्वारा सक्रिय होते हैं , जागृत होते हैं तो साधक के समक्ष एक नवीन संसार का द्वार खुल जाता है जिसमें प्रवेश कर वह आश्चर्य से भर जाता है | चक्रों के सक्रियकरण के फलस्वरूप , भीतर छिपी क्षमताओं के जागृत होने से साधक के व्यक्तित्व में विशेष गुण प्रकट होने लगते हैं | वह सांसारिक क्षेत्र में भी सफलता की और अग्रसर होने लगता है तथा आध्यात्मिक क्षेत्र में भी उत्तरोत्तर आगे बढ़ने लगता है , उसके सम्पर्क में आने वाले लोग उसके विलक्षण गुणों से प्रभावित होने लगते हैं |

ध्यान का यह संसार , भीतर का यह संसार बहुत सुंदर , मोहक तथा अद्भुत है तथा मानव जीवन इसमें प्रवेश का स्वर्णिम अवसर है | अतः इस लोक की और अदम बढाकर इस अवसर का लाभ उठाने के लिए उद्धत हों और फिर आप देखेंगे कि चहुँ और आनंद की वर्षा हो रही है तथा जीवन का प्रत्येक क्षण आनंद से पूर्ण हो उठा है |

5 comments:

  1. 🙏 🌷🙏 🌷🙏 🌷🙏 🌷🙏 कैसे मान लूँ कि तुम पल पल में शामिल नहीं.
    कैसे मान लूँ कि तुम हर चीज़ में हाज़िर नहीं.
    कैसे मान लूँ कि तुम्हें मेरी परवाह नहीं.
    कैसे मान लूँ कि तुम दूर हो पास नहीं.
    देर मैंने ही लगाई तुम्हें पहचानने में मेरी दीदी.
    वरना तुमने जो दिया उसका तो कोई हिसाब ही नहीं.
    जैसे जैसे मैं सर को झुकाती चली गयी
    वैसे वैसे तुम मुझे उठाती चलीं गयीं।
    हरि ॐ दीदी ।

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  2. Very well said.By the practice of meditation I am becoming more relaxed,more efficient and happier in all that I do,both for others and myself.My sadguru ARCHNA DIDI JI hastaught us to remain calm and think positive and remain happy. Hari om

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  3. Very well said.By the practice of meditation I am becoming more relaxed,more efficient and happier in all that I do,both for others and myself.My sadguru ARCHNA DIDI JI hastaught us to remain calm and think positive and remain happy. Hari om

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