एकाग्रतक की शक्ति
यह समस्त संसार परम सत्ता की क्रीडा मात्र है | यह परम उर्जा ही जड़ – चेतन में सर्वत्र व्याप्त होकर इस सृष्टि का संचालन करती है | प्रकृति का कण कण उस परम उर्जा की शक्ति से ही ओत्र प्रोत है | सभी जीवों में , पड़ पौधों में , मनुष्य में वही उर्जा व्याप्त है तथा प्रकृति ने मनुष्य योनी में सर्वाधिक संभावना दी है कि यदि मनुष्य इस उर्जा कों उचित दिशा में प्रवाहित कर उसका सदुपयोग करे तो वह असम्भव कों भी सम्भव करके दिखा सकता है | इसके लिए एक गुण जिसकी सर्वाधिक आवश्यकता है --- वह है एकाग्रता |
एकाग्रता अर्थात बिखरी उर्जा कों एकत्रित करके एक दिशा में प्रवाहित करना तथा इसके लिए आवश्यक है – स्थिरता का होना | जब व्यक्ति स्वयं कों स्थिर करके , एकाग्रतापूर्वक किसी भी कार्य को करता है तो उसका परिणाम सदैव विलक्षण होता है | जब एकाग्रता इतनी अधिक बढ़ जाती है कि व्यक्ति आत्मविस्मृत होकर उसमे खो जाता है , अहम को पूर्णतः विगलित कर देता है तो फिर कुछ ऐसा सर्जन होता है , कुछ ऐसा घटित होता है कि व्यक्ति स्वयं आश्चर्यचकित रह जाता है --- कवि , चित्रकार , मूर्तिकार, लेखक , चिंतक, दर्शनिक, वैज्ञानिक इसी शैली से कार्य करते हैं | उदाहरणार्थ --- एक कवि जब स्वयं को खोकर , एकाग्र होकर, भावों में बह जाता है , उसकी कवित्व शक्ति एक ही दिशा में प्रवाहित होने लगती है , फलस्वरूप एक ऐसी कविता का जन्म होता है कि कवि अनायास उसे लेखनीबद्ध करता चला जाता है | सर्जन के पश्चात जब वह स्वयं उसी कविता को पढता है तो आश्चर्यचकित हों जाता है कि यह उसकी रचना है | यही है --- एकाग्रता की शक्ति|
संसारिक क्षेत्र हो अथवा आध्यात्मिक --- विलक्षणता की एक ही कुंजी है ---- एकाग्रता | किसी भी सांसारिक कार्य में सफलता प्राप्ति के लिए एकाग्रचित होना आवश्यक है , इसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नती , साधना में अग्रसर होने के लिए भी एकाग्रता आवश्यक है | इस गुण को व्यक्ति स्वप्रयास से निखार भी सकता है | कुछ व्यक्तियों में यह गुण जन्मजात होता है | वे स्थिर होकर , एकाग्रचित होकर किसी भी कार्य को कुशलतापूर्वक कर लेते हैं किंतु कुछ व्यक्तियों के मन में चंचलता इतनी अधिक होती है कि उतनी उर्जा बिखरी रहती है , वे स्वयं को एकाग्र नही कर पाते |
विचारणीय है कि व्यक्ति उन्हीं कार्यों में एकाग्र होता है जिसमें उसकी रूचि होती है तथा जिसमें उसे प्रसन्नता मिलती है | बच्चे जितने एकाग्र खेल में होते हैं, उतने अध्ययन में कभी नही होते क्योंकि खेल में उन्हें प्रसन्नता मिलती है | अतः एकाग्रता वृद्ध के लिए आवश्यक है --- कार्य विशेष में रूचि उत्पन्न करना | साथ ही ऐसी अनेक ध्यान विधियाँ एवं यौगिक क्रियाएँ भी हैं जो एकाग्रता वृद्धि में सहायक होती हैं | इनके निरंतर अभ्यास से एकाग्रता का स्तर बढ़ने लगता है |
जिस दिन आप एकाग्र होने कि यह कला सीख लेंगे , उस दिन से आपके जीवन में सफलता के नए द्वार खुल जायेंगे | ईश्वर करे कि सकारात्मक दिशा में एकाग्र होते हुए आप जीवन में उन्नतिशील हों |
Hariom Guru Archna Didi
ReplyDeleteHariom Guru Archna Didi
ReplyDeleteदीदी तन, मानव नहीं , प्रभु का हैं अवतार
ReplyDeleteइस तन में त्रिलोक है, पूजो बारम्बार।